24 July 2017

हरी मुस्कुराहटों वाला कोलाज ~ 2

वर्ष दो हजार दस का उतरार्ध था वो । जून के महीने ने अपने आगमन की किलकारी भरी ही थी । चोटियों से पिघलती बर्फ़ की आमद वादी की सतह को वो फिचफिचाती कीचड़ वाली बनाने में बड़ी शिद्दत से जुटी हुई थी । श्रीनगर से लेह को जाने वाले फ़ौजी गाड़ियों के दैनिक लंबे काफ़िले ने अभी-अभी उसकी चौकी की जिम्मेदारी वाली सड़क के लगभग पचीस किलोमीटर वाले फैलाव को पार कर पड़ोस वाले सैन्य चौकी के इलाके में प्रवेश कर लिया था । वायरलेस सेट पर इस ख़बर की पुष्टि होते ही उस नाॅट-सो-टाॅल, लेकिन निश्चित रूप से डार्क और हैंडसम कैप्टेन ने चैन की गहरी साँस भरी । पचीस किलोमीटर के फैलाव में मुस्तैदी से तैनात अपने जवानों को एलर्ट रहने की ताकीद कर वो लौट ही रहा था अपनी चौकी की तरफ कि वायरलेस पर आ रहा उत्तेजित सा संदेश उसके पूरे वजूद के संग-संग इर्द-गिर्द की हवा को भी जैसे हजार वाट का करेंट दे गया ।

"चार्ली पिकेट फाॅर टाइगर... जल्दी आओ वरना केहर सिंह मार डालेगा इस औरत को...ओवर !"

वायरलेस आॅपरेटर की आवाज़ में छुपी हुई व्याकुलता कैप्टेन के कानों से उतरती हुई रगों में दौड़ने लगी थी, जब उसने अपने ड्राइवर को जिप्सी वापस मोड़ने का हुकुम दिया चार्ली पिकेट की जानिब । बमुश्किल दस मिनट आगे ही था वो चार्ली पिकेट और इस दस मिनट में कैप्टेन साब ने हवलदार केहर सिंह का पूरा बायोडाटा अपने स्मृति-पटल पर दसियों बार दौड़ा लिया । सीधा-सादा, एकदम डिसिप्लीन्ड, दो बच्चों का पिता, तनिक वज़नदार लेकिन शारीरिक रूप से बिलकुल फिट केहर...क्या समस्या खड़ी कर सकता है वो ? जिप्सी की रफ़्तार के साथ जैसे कैप्टेन की बेचैनी रेस लगा रही थी उस सर्पिल सी टेढी-मेढी सड़क पर ।

अच्छा-खासा मजमा जमा हुआ था वहाँ, जब कैप्टेन पहुँचा । पिकेट से सटी हुई बस्ती के स्थानीय कश्मीरियों की भीड़ में घिरे पिकेट के चार जवान दूर से ही दिख रहे थे कैप्टेन को जिप्सी की विंड स्क्रीन के पार । किसी अनिष्ट की आशंका के लिये ख़ुद को तैयार करता हुआ कैप्टेन जब जिप्सी से उतरा तो बस्ती के तमाम लोग हँसते-ठिठयाते दिखे उसे और हवलदार केहर सिंह एक लगभग दस वर्षीया कश्मीरी गुड़िया को गोद में बिठाये अपने पैक्ड लंच से पूरियाँ खिला रहा था । कहानी यूँ खुली कि अनिष्ट की आशंका से डसा हुआ कैप्टेन अपने बुलंद अट्टहास को रोक ना पाया...

... उस कश्मीरी गुड़िया की माँ जाने किस आवेश में अपनी बेटी की बेतरह पिटाई कर रही थी और उस छुटकी का रुदन दूर कुमाऊँ के पहाड़ों में बैठी अपनी बेटी की याद दिला रहा था हवलदार केहर को, जो उस वक़्त अपनी ड्यूटी पर वहीं निकट खड़ा था । औरत को तीन-चार बार गुहार लगाया उसने छुटकी को छोड़ देने के लिये, मगर जब वो नहीं मानी तो फिर केहर सिंह के रौद्रावतार ने पहले तो ज़ोर का धक्का दिया औरत को और छुटकी को गोद में उठा लिया । माँ जब उग्रचंडिका बनी हुई केहर पर झपटी तो फिर सब कुछ केहर सिंह की बर्दाश्तीय क्षमता से परे हो गया था । कैप्टेन को बस्ती वालों ने बताया कि कैसे छुटकी को गोद में उठाये थप्प्ड़ों की मूसलाधार वृष्टि ले आया थे हविलदार साहिब ! छुटकी के पिताश्री समस्त बस्ती वालों के समूह में सबसे अग्रणी थे केहर के समर्थन में ये कहते हुये कि ठीक किया हविलदार साहिब ने इस बदतमीज़ औरत के साथ... ऐसे ही करती है ये बच्चों के साथ हर रोज़...अब अक़ल ठिकाने रहेगी ।

वापस लौटते हुये मुस्कुराते कैप्टेन साब के पास शाम के लिये अपनी शरीक़े-हयात को मोबाइल पर सुनाने के लिये एक दिलचस्प क़िस्सा था !







हाथ थे मिले कि ज़ुल्फ़ चाँद की संवार दूँ
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमि पर उतार दूँ ... 


( तस्वीर गूगल से साभार और आख़िर की पंक्तियाँ नीरज के एक विख्यात गीत से )

18 July 2017

इश्क़ उचक कर देख रहा है, हुस्न छुपा है ज़रा-ज़रा...

एक अरसा ही तो बीत गया जैसे ब्लौग पर कोई ग़ज़ल लगाए...तो इस 'एक अरसे' का अंत यहीं एकदम तुरत ही और एक ताज़ा ग़ज़ल:- 

आधी बातें, आधे गपशप, क़िस्सा आधा-आधा है
इसका, उसका, तुम बिन सबका चर्चा आधा-आधा है

जागी-जागी आँखों में हैं ख़्वाब अधूरे कितने ही
आधी-आधी रातों का अफ़साना आधा-आधा है

तुमसे ही थी शह्र की गलियाँ, रस्ते पूरे तुमसे थे
तुम जो नहीं तो, गलियाँ सूनी, रस्ता आधा-आधा है

इश्क़ उचक कर देख रहा है, हुस्न छुपा है ज़रा-ज़रा
खिड़की आधी खुली हुई है, पर्दा आधा-आधा है

उन आँखों से इन आँखों के बीच है आधी-आधी प्यास
झील अधूरी, ताल अधूरा, दरिया आधा-आधा है

ग़ुस्से में तो फाड़ दिया था, लेकिन अब भी अलबम में
जत्न से रक्खा फोटो का वो टुकड़ा आधा-आधा है

बाद तुम्हारे जाने के ये भेद हुआ हम पर ज़ाहिर
रोना तो पूरा ही ठहरा, हँसना आधा-आधा है


[ jankipul.com में प्रकाशित ] 

10 July 2017

इक ज़ख़्म मैं मुरीद तो इक ज़ख़्म पीर मैं...

{कथादेश के मई अंक में प्रकाशित "फ़ौजी की डायरी" का तीसरा पन्ना}

जी ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत...कि रात-दिन बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किये हुए...ढेर-ढेर सारी फ़ुरसतें...दोस्तों-से-झूठी-मूटी-दूसरों-का-नाम-लेकर-वो-तेरी-बातें-करना-वाली फ़ुरसतें कि इन लम्बी-लम्बी रातों के अफ़साने गढ़ सकूँ इन फ़ुरसतों में | सरहद पर रातें लंबी होती हैं...अक्सर तो उम्र से भी लंबी...बेचैन, आशंकित, चौकस रतजगों में लिपटी हुईं | इन रतजगों के जाने कितने अफ़साने हैं जो लिखे नहीं जा सकते...जो सुनाये नहीं जा सकते...और सुनाये जाने पर भी इनके आम समझ से ऊपर निकल जाने का भय रहता है | युद्धइन तमाम अफ़सानों का केन्द्रीय किरदार होता | कश्मीर की दुर्गम, बर्फ़ में दबी-ढँकी ठिठुरती-सिहरती हुई सरहदों पर हर रोज़ ही तो एक युद्ध होता है | कौन देख पाता है इन अंतहीन रोज़-रोज़ के युद्धों को, सिवाय इन प्रहरियों के !

वैसे युद्ध बस सरहद पर ही नहीं लड़े जाते ! कई बार सैनिकों के लिए भी...युद्ध बस सरहद पर नहीं लड़े जाते सामने पत्थर-फेंक दूरी पर खड़ा आँखों से आँखें मिलाता हुआ दुश्मन या फिर ज़मीनी बनावट और ख़राब मौसमों का फायदा उठाकर कथित जेहाद के नाम पर अंदर घुस आने को उतावले आतंकवादियों का दस्ता...ये सब मिलकर या अलग-अलग विगत तीन-साढ़े तीन दशकों से लगातार युद्द जैसी स्थित ही तो उत्पन्न करते रहे हैं | कहने को  बेशक इसे लो इंटेसिटी कंफ्लिक्टकह कर नकारने की कोशिश करते रहें हम, हर तीसरे दिन की शहादत कुछ और कहानी कहती है...कहानी, जो सौ साल पहले के उस महान प्रथम विश्व-युद्ध के बनिस्पत एक लघु-कथा से ज्यादा और कुछ नहीं, किन्तु यही लघु-कथा रात-दिन इन ठिठुरती-सिहरती सरहदों पर निगरानी में खड़े एक भारतीय सैनिक के लिए किसी महाकाव्य से कम का विस्तार नहीं देती है | पूरे मुल्क की सोचों, निगाहों में अलग-थलग कर दिया ये अकेला भारतीय सैनिक इसी अनकही कहानी के पार्श्व में एक सवाल उठाता है कि क्या वजह है कि सौ साल पहले के उस महायुद्ध के पश्चात जब सम्पूर्ण यूरोप, अमेरिका या फिर जर्मनी भी एक मजबूत ताकत के रूप में, एक व्यवस्थित विकसित मुल्क के रूप में उभर कर आए और अपना ये मुल्क स्वतंत्रता-प्राप्ति के उपरांत पाँच-पाँच युद्ध देख चुकने के बाद भी एक चरमरायी सी, असहाय विवश व्यवस्था की छवि प्रस्तुत करता है पूरे विश्व के समक्ष ?

युद्ध कभी भी वांछित जैसी चीज नहीं हो सकती है...और खास कर एक सैनिक के लिए तो बिलकुल ही नहीं | किसी भी युद्ध के दौरान एक सैनिक को मौत या दर्द या ज़ख्म से ज्यादा डर उसको अपने वर्दी की और अपने रेजीमेंट की इज्जत खोने का होता है और कोई भी युद्ध वो इन्हीं दो चीजों के लिए लड़ता है...बस ! अपनी हरी वर्दी के लिए और अपने रेजिमेंट के नाम-नमक-निशान के लिए ! ऐसी हर लड़ाई के बाद वो अपने मुल्क और इसके लोगों की तरफ बस इतनी-सी इच्छा लिए देखता है कि उसके इस जज़्बे को पहचान मिले...उसकी इस क़ुरबानी को सम्मान मिले | प्रथम विश्व-युद्ध के पश्चात उसमें शामिल हर मुल्क में सैनिकों को उसी स्नेह और सम्मान से देखा गया (देखा जा रहा है) जिसकी ज़रा सी भी अपेक्षा वहाँ के सैनिकों के मन में थी | किन्तु यहाँ इस मुल्क में अपेक्षा के विपरीत उपेक्षा का दंश लगातार झेलते रहने के बावजूद भारतीय सैनिक फिर भी हर बार हर दफ़ा जरूरत पड़ने पर यहाँ सरहद के लिये जान की बाज़ी लगाता है | वो देखता है असहाय अवाक-सा कि कैसे कुछ मुट्ठी भर उसके भाई-बंधुओं द्वारा चलती ट्रेन में की गई बदतमीजी को उसके पूरे कुनबे पर थोप दिया जाता है...कि कैसे चंद गिने-चुने उसके साथियों के हाथों उत्तर-पूर्व राज्यों या कश्मीर के इलाकों में हुई ज्यादातियों के सामने उसके पूरे युग भर की प्रतिबद्धता को नकार दिया जाता है एक सिरे से...वो तिलमिलाता है, तड़पता है, फिर भी ड्यूटी दिये जाता है | सरहद पर चीड़ और देवदार के पेड़ों से उसे ज्यादा स्नेह मिलता है, बनिस्पत अपने मुल्क के बाशिंदों से | सामने वाले दुश्मन की छुद्रता, गुपचुप वार करने वाले आतंकवादियों की धृष्ठता, मौसम की हिंसक मार, मुश्किल ज़मीनी बनावट का बर्ताव जैसे हर रोज़ के छोटे-छोटे युद्धों से लड़ता वो अपने मुल्क के इस सौतेले व्यवहार से भी एक युद्ध लड़ता है...युद्ध बस सरहद पर नहीं लड़े जाते !

इधर अप्रैल का महीना तो आधा से ज़्यादा गुज़र चुका है, लेकिन ये वाला साल है कि पुराने साल की ठिठुरन को अब तलक अपने बदन पर लपेटे हुये है | बंकर से बाहर निकलने के लिए बर्फ ने जो सीढ़ियाँ तैयार कर रखी है, वो घटती मालूम ही नहीं पड़ रहीं | अभी तक उतुंग सी बेहया की तरह सर उठाये खड़ी हुयी हैं | सब कुछ जैसे गीला-गीला सा...पूरे का पूरा वजूद तक....वजूद की अनंत तलहट्टियाँ तक | प्रचंड सूर्य की प्रखर धूप के लिए बेचैन विकल मन समूचे सूर्य को ही उतार लाना चाहता है बंकर की छत पर मानो ! धूप की जलती सी रस्सी जो होती एक काश, जिस पर पूरे बदन को निचोड़ कर सूखने के लिए टांग देता कोई !

रातें उम्र से भी लंबी हैं और दिन उस लंबी उम्र का फकत एक लम्हा जैसे !

...और रात लिये रहती है याद-सी कोई याद तुम्हारीड्यूटी की तमाम बंदिशों में भी और रात भर बजता रहता है ये बगल में रखा छोटा-सा मोटोरोला का रेडियो-सेट, निकट दूर खड़े तमाम प्रहरियों से मेरे बंकर को जोड़ता हुआ...अल्फा ऑस्कर किलो ओवर” (ऑल ओके ! ओवर !!) करता हुआ | जानती हो, तुम्हारी याद दिलाता है ये कमबख़्त छोटा सा रेडियो सेट...हर बार, बार-बार...घड़ी-घड़ी ऑल ओके ओवरकी रिपोर्ट देता हुआ !

हाँ ! सच में !! तुम सा ही पतला-दुबला, तुम सा ही सलोना और भरोसेमंद भी...और जब भी बोलना होता है इसमें कुछ, लाना पड़ता है इसे होठों के बिलकुल पास...ठीक तुम-सा ही तो !

हँसोगी ना तुम जो कभी इस डायरी को पढ़ोगी ?

काश कि दूर इन बर्फीले पहाड़ों से इसी के जरिये कर पाता मैं...तुम संग भी ओके ओवर...कभी-कभार मिस यू ओवर...और थोड़ा-सा लव यू ओवरभी !

...और जो यूँ होता तो क्या तब भी ये रातें उम्र सी ही लंबी होतीं ?

हा हा...ये लम्बी ठहरी हुई पसरी-पसरी रातें और तो कुछ करें ना करें, मेरे अच्छे-भले सोल्जर को कहीं पोएट ना बना डालें ! फ़रहत एहसास का शेर याद आता है:-


मुझ तक है मेरे दुख के तसव्वुफ़ का सिलसिला
इक ज़ख़्म मैं मुरीद तो इक ज़ख़्म पीर मैं

01 July 2017

हरी मुस्कुराहटों वाला कोलाज ~ 1

साल 92 का अक्टूबर महीना था वो... हिमाचल की पहाड़ियाँ ठंढ से कुनमुनाने लगी थीं । उन्हीं पहाड़ियों पर बसे परवानू के ख्यात रिसौर्ट टिम्बर ट्रेल की केबल कार दो परिवारों के ग्यारह सदस्यों को लेकर बीच रस्ते में अटक गई, सवार लोगों की साँसें भी जस की तस अटकाती हुयी । एक सदस्य के नीचे घाटी में गिर जाने के बाद उस केबल कार में पसरा हुआ भय जाने कितना कम हुआ दूर से सेना के हेलिकाॅप्टर को आते देखकर, ये शोध का विषय हो सकता है ! सेना का हैलिकाॅप्टर आया रेसक्यू आॅपरेशन के लिये और साथ लेकर आया डेयर डेविल मेजर इवान क्रैस्टो को । उसके बाद की कहानी शौर्य व धीरता की मिसाल ही तो बन गई है !

हेलिकाॅप्टर के तेज़ गति से घूमते पंखों से हिलता हुआ केबल पूरे रेसक्यू
आॅपरेशन को दुश्वार कर रहा था और सर्द रात को ज़िद पड़ी थी एकदम से आने की । फैल रहे अँधेरे ने विवश कर दिया हेलिकाॅप्टर को वापस जाने के लिये । अभी तक बस पाँच लोग ही सकुशन निकाले गये थे । बचे हुये पाँच लोगों की मानसिक स्थिति की कल्पना ही की जा सकती है कि उस लटके हुये केबल कार में पूरी रात गुज़ारना और हेलिकाॅप्टर के वापस आने का सुबह तक इंतज़ार करना...स्वंय सृष्टि निर्माता भी साक्षात प्रगट होते तो उन पाँचों को ढाढस के दो बोल ना कह पाते !

किंतु मेजर ने आश्वस्ति के शब्दों को उकेरने के बजाय उन पाँचों के साथ उसी केबल कार में रात गुज़ारने का फैसला किया । मेजर का लाॅजिक बड़ा ही क्रिस्प और प्रिसाइज था कि ख़ुद दो बच्चों का पिता होकर उस केबल कार में फँसे लोगों के साथ रात गुज़ारने से बड़ा संबल और क्या हो सकता उनके लिये !

रात भारी थी । डरे लोगों की उल्टियाँ और अन्य विसर्जित अवशेषों की ख़ुश्बू केबल कार के नीेचे गिर जाने की सोच से कहीं ज़्यादा भयंकर थी । सुबह की पहली किरण जब हेलिकाॅप्टर लेकर आयी थी, ये जानना दिलचस्प होगा कि मौत के भय से आतंकित उन पाँच लोगों की ख़ुशी ज़्यादा बड़ी थी या नैसर्गिक ख़ुश्बू से मेजर को निजात पाने का सकून ज़्यादा बड़ा था । फेंकी हुई रस्सी से एक-एक कर उन पाँच लोगों को बाँध कर वापस हेलिकाॅप्टर में भेजने के बाद जब मेजर सबसे आख़िर में सवार हुआ, रात भर हनुमान चालीसा का जाप करने वाली प्रौढा ने मेजर को देर तक भींचे रखा हेलीकाॅप्टर में कि जैसे घनघोर तपस्या के बाद उनका बजरंग बली ही साकार रूप लेकर आ गया हो सेना की वर्दी में !

[ जो पढे आँखें मेरी मुझको वो दीवाना कहे / तू भी तो इनको कभी फ़ुरसत से पढ कर, ग़ौर कर ]

22 June 2017

(अ)सैनिक-व्यथा

उदासियों के बेतरतीब से मैट्रिक्स को तरतीब देती व्यथाओं का कोई पैटर्न नहीं होता...और जो हो भी, तो कौन जोहमत उठाये बुनने की ! कोई ठहराव आख़िरी कहाँ होता है ? हर ठहराव में भी एक चलना नहीं (अ)व्यक्त होता रहता है क्या हर लम्हा ?  और ये सारे सवाल भी आख़िर किससे...ठहराव से या चलते रहने से ? 

कि मेरे विराम में भी चलना निहित था
और तुम देखते रहे
बस ठहराव मेरा

कि उन क्षणों का आर्तनाद
जिन्हें तुम स्वप्न में भी
नहीं चाहोगे सुनना
और जिन्हें भोगना था मेरी नियति
भोगने की चीख़ नहीं सुनी तुमने
नियति की किलकारियाँ सुनी

कि प्रतिबद्धताओं की नई परिभाषायें
लिखने में टूटी उँगलियों से
लिखा नहीं जाता जवाब
तुम्हारे सवालों में छुपे आरोपों का

कि सच तो ये है
कोई मायने नहीं रखता
ये देखना
ये सुनना
ये सवाल उठाना...

...जब पिता की विलुप्त होती स्मृतियों में भी
नहीं रहता शेष
मेरा समर्पण या मेरा शौर्य

किंतु बचा रह जाता है
मेरी वाजिब अनुपस्थितियों का
ग़ैरवाजिब निकम्मापन